Thursday, 5 January, 2023

Khulasa Rajgarh M.P.-श्रीमद् भागवत कथा में सत्यप्रिया दीदी के मुखारविंद से बरस रहा धार्मिक रस

श्रीमद् भागवत कथा में सत्यप्रिया दीदी के मुखारविंद से बरस रहा धार्मिक रस

चौथे दिवस की कथा में कहीं मार्मिक प्रसंगों के जरिया ईश्वर भक्ति बताएं

ब्यावरा। भगवान कृष्ण ने जो कहा है वह हमें करना चाहिए तथा भगवान राम ने जो किया है वह हमें करना चाहिए भगवान राम कर्तव्य एवं आदर्श की प्रतिमूर्ति हैं जबकि भगवान कृष्ण 16 कलाओं के देवता हैं। उन दोनों के आदर्शों को प्रत्येक व्यक्ति को अपनाना चाहिए। आज चतुर्थ दिवस का कथा के प्रवाह आगे बढ़ाते हुए साध्वी दीदी सत्यप्रिया ने प्रसंग को बढ़ाते हुए कहा कि दुनिया में सब शब्दों का विलोम शब्द है पर आनंद का कोई पर्यायवाची नहीं है आनंद अपने आप में पूर्ण है आनंद परमेश्वर का नाम है पंचतत्व से यह शरीर बना हुआ है, जिसकी मृत्यु होना सुनिश्चित है और जो पूर्ण है उसकी मृत्यु नहीं होती प्रत्येक व्यक्ति को अच्छे कार्य का संकल्प अवश्य लेना चाहिए, जिससे उसका मानव जीवन सफल हो जाए ईश्वर ने प्रत्येक जीव एवं व्यक्ति में अद्भुत गुण दिए हैं जैसे कि किसी का भी चेहरा किसी से नहीं मिलता पूरे विश्व में सब को अलग-अलग गुण प्रदान किए हैं यह कितना अद्भुत संसार है भगवान का नाम लेने वाला कभी विफल नहीं होता और उसे भगवान के नाम का फल अवश्य प्राप्त होता है धन संसाधन को लूटा जा सकता है पर विद्या को कभी कोई नहीं लूट सकता गणिका ने अपने छोटे पुत्र का नाम नारायण रखा था, जिससे उसका उद्धार हो गया इसलिए हर व्यक्ति को ईश्वर के नाम का स्मरण करते रहना चाहिए जिससे व्यक्ति का इस कलयुग में उद्धार हो सकता है कलयुग में ईश्वर का नाम जप ही एकमात्र उपाय है। स्त्री लक्ष्मी का रूप होती है जिस घर में स्त्री का अपमान होता है उस घर से रिद्धि-सिद्धि चली जाती है। इसलिए स्त्री का हर व्यक्ति को सम्मान करना चाहिए स्त्री शक्ति स्वरूपा है। भगवान अपने भक्तों का अपमान कभी सहन नहीं करते भक्त प्रल्हाद की भगवान ने रक्षा की इसलिए जितने भी साधु संत भगवान के भक्त हैं, उनका कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिए इस कथा का सार है कि भगवान के प्रति समर्पित रहकर नाम जप स्मरण करते रहिए व्यक्ति शिखर पर तभी तक टिका रह सकता है जब तक वह सरल हृदय रहता है जैसे ही व्यक्ति में हंकार आता है उसका सर्वस्व धीरे-धीरे नष्ट होने लगता है, इसलिए अहंकार त्याग कर सरल बनकर ईश्वर के प्रति समर्पित रहना तथा अपने कर्तव्यों का पालन करना ही ईश्वर की भक्ति है।

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