Khulasa साहित्यिकि//– हां मैं एक प्रेम कविता लिखना चाहता हूं अब भी इस गहरे अंधकार में – अशोक जमनानी

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हां मैं एक प्रेम कविता
लिखना चाहता हूं अब भी
इस गहरे अंधकार
में – अशोक जमनानी

हां मैं एक प्रेम कविता
लिखना चाहता हूं अब भी
इस गहरे अंधकार में
जब चिताओं से उठी रोशनी भी
ढकी जा रही है
ताकि आग न पकड़ ले कहीं
महल किसी संन्यासी का
जब बीमार हो चले हैं अस्पताल
बेशुमार लूट के बाद भी
जब मौत की खबरों ने
फूंक दी है जान
मरते हुए अखबारों और खबरिया चैनलों में
जब भीड़ जुटाई जा रही है भारी
और धारा एक सौ चवालीस का आदेश
किया जा रहा है जारी
जब कर्फ़्यू है पड़ोस के जिले में वहां
ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में मतदान की
जारी हुई है अपील जहां
जब चुनाव में बांटने के लिए शराब
कम नहीं पड़ रही है कहीं
तब कम तो सुना आक्सीजन पड़ गई है वहीं
वोट के बदले रुपए बांटने वाले छुटभैये को
नहीं है भरोसा उस नेता पर
जिसका जानता है वह समस्त छल बल
पर बचा लिए हैं रुपए उसने कुछ
हो सकता है ब्लैक में खरीदना पड़े इंजेक्शन कल
शाही स्नान में जुटी भीड़ के
आनंदित मुख देखता हूं
तो लगता हैै

मृत्यु एक महा उत्सव है मेरे मुल्क में
जब ग़रीब की मुट्ठी में दबे दानों से
अमीरों के छलकते पैमानों से
कुछ मध्यम वर्गीय लोग इसलिए हैं नाराज़
क्योंकि उनके पॉलिश्ड जूतों के भीतर
जो फटे हुए मोजे हैं
वे दुर्गंध से बजबजा रहे हैं लगातार
सेल से खरीदे ब्रांडेड पैंट शर्ट के नीचे
फटी हुई हैं चड्डी बनियान
पर वे मरने से पहले खुश भी हैं
क्योंकि उन्होंने इंश्योरेंस पॉलिसी ले रक्खी है
कब्रिस्तान में ज़मीन नहीं है
श्मशान में लकड़ियां नहीं हैं
अस्पताल में मुर्दे को छुड़ाने के लिए रुपए नहीं हैं
चौराहे पर पुलिस से पिटकर आया हुआ आदमी
अपने बच्चों को पीट रहा है
पिटते हुए बच्चे
पीटते हुए आदमी
छुड़ाती हुई औरतें
सब चीख रहे हैं
ऐसे में
मैंने
हाथ सैनेटाइज कर लिए हैं
मास्क लगा लिया है
और ज़िंदगी में जो गलती से
बचा खुचा प्रेम है उससे
दो गज की दूरी पर बैठा हुआ मैं
हां मैं
एक प्रेम कविता लिखना चाहता हूं
अब भी
जब …

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अशोक जमनानी

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