Rewa MP Khulasa//भारत मे प्रतिवर्ष लगभग 75 लाख के हिसाब से बढ़ रहे हैं कोर्ट केस चिंता का विषय – शैलेश गांधी

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वर्चुअल सुनवाई के लिये ई-फाइलिंग, ई-पेमेंट और ई-एफिडेविट ई-कमेटी की अनुसंशा हों लागू-पूर्व सूचना आयुक्त शैलेश गांधी// भारत मे प्रतिवर्ष लगभग 75 लाख के हिसाब से बढ़ रहे हैं कोर्ट केस चिंता का विषय – श्री गांधी// यदि  बैंकिंग सिस्टम में ई-पेमेंट हो सकता है तो कोर्ट में ई-फाइलिंग क्यों नहीं ?

शैलेश गांधी

44 वें राष्ट्रीय वेबीनार में वर्चुअल हियरिंग और प्रथम अपील सुनवाई के विषय में परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस बीच कार्यक्रम में विशिष्ट वक्ता के रूप में पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने बताया कि भारत के विभिन्न न्यायालयों में प्रतिवर्ष लगभग 75 लाख केसों की पेंडेंसी बढ़ रही है। इस नाते यदि देखा जाए तो 14 साल में करोड़ों केस हो सकते हैं। यदि वर्तमान कोरोना महामारी की बात करें तो पिछले 2 वर्ष से लॉक डाउन की स्थिति बनी हुई है ऐसे में न्यायालयीन कार्य पूरी तरह से प्रभावित हो चुके हैं। लोगों की जिंदगी को भी दांव पर नहीं लगाया जा सकता इसलिए स्थिति को मद्देनजर रखते हुए वर्चुअल सुनवाइयां एक नीड आफ द आवर समय की माग के रूप में सामने आए हैं।

श्री गांधी ने बताया की कोर्ट में वर्चुअल सुनवाई का कार्यक्रम प्रारंभ किया गया था लेकिन इसके बाद कोर्ट ने इसे स्वयं बंद कर दिए। एक हफ्ते में 2 या 4 घंटा ही वर्चुअल कोर्ट चलती है बाकी समय लोग छुट्टियां ले लेते हैं। जज भी छुट्टी ले लेते हैं। शैलेश गांधी ने बताया कि उन्हें ऐसा महसूस होता है कि कोविड-19 को ठीक करने में डॉक्टर को जितना खतरा लगता है वर्चुअल न्याय देने में जज साहब को भी उतना ही खतरा लग रहा है। हालांकि यदि वर्चुअल काम किया जाए तो कोई खतरा नहीं है। यदि भौतिक तौर पर देखा जाए तो ज्यादा खतरा है।

सुप्रीम कोर्ट में लाखों केस पेंडिंग पड़े हुए हैं ऐसा ही हाल नीचे की अदालतों का भी है। हमने इस विषय पर विचार किया और शोध किया तो यह पाया कि इसके पीछे जो अधिवक्ताओं का संगठन है वह काफी हद तक जिम्मेदार है। दिल्ली मुंबई जैसे बड़े शहरों में कार्य करने वाले अधिवक्ता वर्चुअल हियरिंग नहीं चाहते क्योंकि उनको लगता है कि उनकी कमाई प्रभावित हो जाएगी। उनकी नजर में यदि लोग परेशान होकर भौतिक रूप से कोर्ट आते जाते हैं तो इससे ऐसे अधिवक्ताओं का ज्यादा फायदा होता है।

सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी की अनुसंशा पूरी तरह से अब तक एक निष्फल प्रयास -शैलेश गांधी

पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त ने बताया कि यह भी ध्यान देने योग्य है कि सुप्रीम कोर्ट ने कई वर्ष पहले एक ई-कमेटी बनाई है इसके लिए 2309 करोड़ 51 लाख दस हजार रुपए खर्च हो चुका है। जिसमें कंप्यूटर इंटरनेट प्रिंटर स्कैनर और अन्य ई-फाइलिंग से जुड़ी हुई व्यवस्था का होना बताया गया है। परंतु यह सब तामझाम तो हुआ है लेकिन इन सब का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। अब सवाल यह है कि 2309 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी हमने क्या हासिल किया? यहां सबसे बड़ा हास्यास्पद विषय यह है कि सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी ने कहा कि ई-फाइल भेज दो सब इलेक्ट्रॉनिक रूप में भेज दो। कई हाईकोर्ट ने भी ई-फाइल की माग की लेकिन फिर बाद में उस फाइल की प्रिंटिंग की गई, हार्ड कॉपी भी मंगवाई गई, उसका स्कैन किया गया, यह सब काफी मूर्खतापूर्ण कहा जा सकता है और मात्र भारत में ही यह सब देखा जा सकता है।

यह सब क्यों हो रहा है? इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में अधिवक्ताओं की एक शक्तिशाली लॉबी है जो अपने लाभ के लिए वर्चुअल कोर्ट का विरोध कर रही है। यह अधिवक्ता कहते हैं कि वर्चुअल कोर्ट से कई समस्या आ जाएगी और कोर्ट में पावर नहीं रहेगी। लेकिन सवाल यह है कि कोर्ट में पावर चाहते हैं अथवा जनता को पावर देना चाहते हैं। लोकतंत्र में एक जगह को पावरफुल बनाने जैसी कोई बात नहीं होती। पावर तो जनता के पास होनी चाहिए। हमें लगता है कि जिस प्रकार राहुल सिंह ने मध्य प्रदेश सूचना आयोग में फेसबुक लाइव के माध्यम से सुनवाई की है और कुछ अन्य जगहों में भी हो रहा है वैसे ही हमारे जुडिशल सिस्टम में भी होना चाहिए। जो लोग वर्चुअल सुनवाई के लिए जाना चाहते हैं उन्हें वर्चुअल सुनवाई का मौका दिया जाना चाहिए और जो लोग भौतिक रूप से फिजिकल सुनवाई में उपस्थित होना चाहते हैं उन्हें फिजिकल सुनवाई का मौका मिलना चाहिए।

पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने बताया कि जो लोग यह कहते हैं कि उनके पास इंटरनेट नहीं है तो यह बात बिल्कुल गलत है क्योंकि लोगों के पास स्मार्टफोन भी होते हैं। एक उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया कि अभी हाल ही में मुंबई हाईकोर्ट ने फिजिकल सुनवाई के लिए एक प्रयोग किया जो कि लोगों की जान के साथ बड़ा खिलवाड़ कहा जाएगा। पुनः जब कोरोना के केस बढ़ने लगे तो कोर्ट ने फिजिकल सुनवाई बंद कर दी और वापस वर्चुअल सुनवाई में आ गई। पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त ने बताया कि कोरोनावायरस के इस बुरे दौर में मात्र वर्चुअल सुनवाई ही एकमात्र सहारा है। हममें से किसी को यह पता नहीं है कि कोविड-19 कब तक चलेगा ऐसे में वर्चुअल सुनवाई ही आधार बचता है अन्यथा कोर्ट में पेंडेंसी बढ़ती जाएगी और लोगों का भरोसा कोर्ट से खत्म होगा।

भारत मे प्रतिवर्ष लगभग 75 लाख के हिसाब से बढ़ रहे हैं कोर्ट केस

शैलेश गांधी ने बताया कि यदि पूरे देश का कोर्ट का डाटा उठाकर देखा जाए तो प्रतिवर्ष लगभग 75 हज़ार से लेकर 1 करोड़ के बीच में केसों में बढ़ोतरी हो रही है। यह सभी केस पेंडिंग पड़े रहते हैं। ऐसे में कोर्ट सिस्टम खत्म हो जाएगा। आज यदि देखा जाए तो औसत लोगों को वैसे भी कोई न्याय की उम्मीद बची नहीं है। लोगों को लगता है कि यह तो कोर्ट का मामला है लेकिन हमें ऐसा लगता है कि इसमें लोगों को बोलना चाहिए। यह वास्तव में कोर्ट का मामला नहीं है बल्कि यह लोकतंत्र और जनतंत्र का मामला है जहां पर हम सब से जुड़ा हुआ है।

यदि कोर्ट में सुनवाई आज बन्द हो गई है तो यह चिंता का विषय है। श्री गांधी ने बताया कि यदि न्याय का डर और उसके प्रति विश्वास बनाए रखना है तो कहीं न कहीं वर्चुअल सुनवाई का जल्द से जल्द प्रारंभ होना अति आवश्यक है।।

यदि बैंकिंग सिस्टम में ई-पेमेंट हो सकता है तो कोर्ट में ई-फाइलिंग क्यों नहीं

पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त ने बताया कि प्रत्येक वर्ष हमारे न्यायालयों में दो करोड़ केस दायर किए जाते हैं। यदि मात्र प्रति केस सौ पन्ने का ही हिसाब लिया जाए तो प्रत्येक वर्ष 12 हज़ार 500 टन पेपर खर्च होता है। और इतने पेपर बनाने में प्रत्येक वर्ष लगभग 3 लाख पेड़ों की बलि चढ़ाई जाती है। इन सब बातों का पर्यावरण पर कितना बुरा प्रभाव पड़ता है वह आज कोरोना वायरस दौर में ऑक्सिजन की मांग को लेकर समझा जा सकता है। यह भी देखा गया है कि फिजिकल सुनवाई से कोर्ट में ज्यादा जगह लगती है और भीड़भाड़ भी बढ़ जाती है परंतु यदि वर्चुअल हियरिंग अथवा ई-फाइलिंग प्रारंभ किया जाए तो पीड़ित अपने घर दफ्तर में केस की सुनवाई ऑनलाइन देख सकते हैं।

वर्तमान डिजिटल दौर में कंप्यूटर इंटरनेट का बहाना उचित नही

शैलेश गांधी ने बताया कि कई बार लोगों का यह भी कहना होता है कि उनके पास इंटरनेट और कंप्यूटर नहीं है इसलिए वह वर्चुअल हियरिंग में सम्मिलित नहीं हो सकते परंतु यह भी गलत तर्क है। महाराष्ट्र में 28 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों का उदाहरण देते हुए श्री गांधी ने बताया कि हर पंचायत में कंप्यूटर इंटरनेट की व्यवस्था के साथ एक अतिरिक्त कर्मचारी भी नियुक्त किया गया है अतः स्वाभाविक तौर पर वर्चुअल सुनवाई की व्यवस्था ग्राम पंचायत स्तर से भी की जा सकती है जहां पर पीड़ित ग्राम पंचायत भवन में उपस्थित होकर वर्चुअल सुनवाई में भाग ले सकता है।

वर्चुअल सुनवाई से सम्बंधित तीन महत्वपूर्ण बातें

पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त ने बताया कि वर्चुअल सुनवाई के विषय में तीन बातें महत्वपूर्ण है। जिनमें प्रथम यह इस सुनवाई में दोनों विकल्प खुले होने चाहिए। यदि पीड़ित चाहे तो वह वर्चुअल सुनवाई के माध्यम से अथवा भौतिक रूप से उपस्थित होकर सुनवाई के माध्यम से भाग ले सकता है। किसी पर कोई दबाव नहीं दिया जाना चाहिए। कोविड-19 का प्रकोप कम होने के बाद जिसको स्वयं भी कोर्ट में आना हो वह भौतिक तौर पर भी उपलब्ध हो सकता है। दूसरा यह कि ई-फाइलिंग, ई-पेमेंट और ई-एफिडेविट यदि स्वीकार किए जाने लगे और सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी के सुझाव को माना जाए तो लोग घर बैठे अपना इलेक्ट्रॉनिक एफिडेविट दे सकते हैं और परेशानी से बच सकते हैं क्योंकि उन्हें दूर कोर्ट जाकर परेशान नहीं होना पड़ेगा।

तीसरी बात बताते हुए श्री गांधी ने कहा की ई-लिस्टिंग के माध्यम से जिस प्रकार सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में समस्त प्रकरणों की ई-लिस्टिंग की जाती है वैसे ही निचले स्तर की डिस्ट्रिक्ट और एडीजे आदि कोर्ट में भी यही व्यवस्था लागू की जानी चाहिए जिससे सभी आवेदकों को ऑनलाइन पता चल जाएगा कि उनके केस की क्या स्थिति है। यदि ओवरराइड करने की शक्ति की बात की जाए तो मात्र ऐसे 5% से भी कम प्रकरणों में ओवरराइड करने के लिए जज के पास शक्ति होनी चाहिए इससे अधिक नहीं। श्री गांधी ने बताया कि ऐसे में सिस्टम ज्यादा पारदर्शी बनेगा और गरीब को न्याय मिलेगा वरना गरीब का केस यदि उसके विरुद्ध होता है तो निर्णय जल्दी दे कर गरीब को सजा दिलवा दी जाती है परंतु यदि गरीब का केस उसके पक्ष में है तो पेशियां दर पेशियां चलती रहती है और गरीब को न्याय नहीं मिलता।

श्री गांधी ने कहा यह सब बदल सकता है लेकिन इसके लिए जनता को आवाज उठानी पड़ेगी इस विषय में बड़े अधिवक्ता वर्चुअल सुनवाई का विरोध कर रहे हैं लेकिन छोटे शहरों में अधिवक्ताओं को इसके फेवर में मांग करनी चाहिए। जहां तक छोटे शहरों में बैठे हुए अधिवक्ताओं का सवाल है तो यह उनके लिए बेहतर होगा कि वह कहीं भी बैठकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के प्रकरणों में वर्चुअल हियरिंग के माध्यम से शामिल हो सकेंगे। श्री गांधी ने कहा कि उनका मानना है कि इससे कोर्ट में भीड़ कम होगी, भागा भागी कम होगी और साथ में जो अन्य सरकारी खर्च होता है वह भी बचेगा और लोगों को परेशानी से निजात मिलेगी।

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शैलेश गांधी ने बताया सभी अर्ध न्यायिक और क्वासी ज्यूडिशियल व्यवस्थाओं में वर्चुअल हियरिंग प्रारंभ कर दी जानी चाहिए। जिससे जनता को इसका काफी लाभ होगा। श्री गांधी ने बताया कि उन्हें ऐसा लगता है कि जनता को इसके विषय में बात करनी चाहिए और सभी छोटे बड़े शहरों में वर्चुअल वेबीनार आदि के आयोजन के माध्यम से यह चर्चा होनी चाहिए। वर्चुअल सुनवाई की मांग से सरकार पर दबाव बनेगा और यह व्यवस्था जल्दी सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी और यह हम सबकी बराबर की भागीदारी और जिम्मेदारी है और सबको मिलकर के प्रयास करना पड़ेगा।

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