पंचायत प्रतिनिधियों का चुनाव के दौरान चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा क्यों न हो सार्वजनिक

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RTI पर ऐतिहासिक 39 वें राष्ट्रीय वेबीनार का हुआ आयोजन // पंचायत के चुने प्रतिनिधियों की चल-अचल संपत्ति का व्योरा हो सार्वजनिक – आयुक्त पैनल // आरटीआई की धारा 4 के तहत वेबपोर्टल पर साझा करने पर हुई सहमति // चुनाव आयोग के पूर्व आदेशों का भी दिया गया हवाला// 15 करोड़ की विकाश राशि कहाँ-कैसे खर्च हुई आम व्यक्ति को जानने का है पूरा अधिकार – राहुल सिंह// प्राइवेट जानकारी बोलकर धारा 8(1)(जे) के तहत जानकारी रोकना आरटीआई कानून के विरुद्ध – शैलेश गांधी।।

दिनांक 21 मार्च 2021, रीवा मप्र।

सूचना के अधिकार कानून को जन जन तक पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हुए प्रत्येक रविवार सुबह 11:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक ज़ूम मीटिंग का आयोजन किया जाता है जिसकी अध्यक्षता मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह करते हैं जबकि विशिष्ट वक्ता के तौर पर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी, पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप, माहिती अधिकार मंच मुंबई के संयोजक भास्कर प्रभु सहित अन्य आरटीआई विशेषज्ञ हिस्सा लेते हैं।

कार्यक्रम में देश के विभिन्न कोनों से सहभागी अपने अपने विचार रखते हैं और कार्यक्रम का लाभ प्राप्त करते हैं। कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाले सहभागीयों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल, जम्मू कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, गुजरात, कर्नाटका आदि प्रदेशों से सहभागी सम्मिलित होते हैं। 

 कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन का कार्य आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी, अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा, छत्तीसगढ़ से आरटीआई कार्यकर्ता देवेंद्र अग्रवाल, अधिवक्ता अंबुज पांडे, शिवेंद्र मिश्रा के द्वारा किया जाता है। पत्रकारिता के क्षेत्र से पत्रिका रीवा के वरिष्ठ पत्रकार मृगेंद्र सिंह का विशेष योगदान रहता है।

पंचायत प्रतिनिधियों का चुनाव के दौरान चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा क्यों न हो सार्वजनिक

जैसे कि हर रविवार को एक नए टॉपिक के साथ आरटीआई ज़ूम मीट का आयोजन किया जाता है इसी परिपेक्ष में रविवार 21 मार्च 2021 को त्रिस्तरीय पंचायत से जुड़े हुए पंचायत प्रतिनिधियों की चल-अचल संपत्ति के ब्यौरे को आरटीआई कानून की धारा 4 के तहत वेब पोर्टल पर साझा किए जाने के चुनाव आयोग के प्रावधान के विषय में 39 वें जूम मीटिंग का आयोजन किया गया। मामले पर अपना विचार रखते हुए देर से जुड़े मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त एवं इस कार्यक्रम के अध्यक्ष राहुल सिंह ने कहा कि अमूमन सांसद और विधायक की चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया के पोर्टल पर साझा किया जाता है। परंतु देखा गया है कि यद्यपि चुनाव आयोग ने स्थानीय निकाय के चुनावों में जनप्रतिनिधियों की चल-अचल संपत्ति के ब्योरे से संबंधित निर्देश और गाइडलाइन तो दिए हैं लेकिन इसको जिला प्रमुखों और प्रशासन के द्वारा कड़ाई से पालन नहीं किया जाता है जिससे आम व्यक्ति को ऐसी सूचना हासिल करने में काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। यदि उसी दृष्टि से देखा जाए तो निश्चित तौर पर पंचायत प्रतिनिधियों की चल अचल संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक किया जाना चाहिए। मध्य प्रदेश में श्री सिंह के द्वारा बताया गया इस दिशा में कार्य किया जा रहा है और काफी आरटीआई और धारा 18 के तहत शिकायतें प्राप्त हुई है इस मामले पर अपना अनुभव साझा करते हुए पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने बताया कि उनके कार्यकाल में भी इस प्रकार चल-अचल संपत्ति के विषय में आरटीआई दायर की जाती थी जिसे दिलवाने के लिए उनके द्वारा आदेशित किया जाता था। सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी के द्वारा पूछा गया की क्या पूर्व सूचना आयुक्त ने इस विषय पर धारा 4 के तहत जानकारी साझा करने के लिए कोई प्रयास किए हैं? इसका जवाब देते हुए आत्मदीप ने बताया कि हमारे समय में ऐसी कोई मांग नहीं की गई है। यदि माग की जाए तो सूचना आयोग को धारा 4 के तहत इस प्रकार की जानकारी साझा करवाने में परहेज नहीं करना चाहिए।

डॉक्टर और मरीज के बीच जानकारी किस धारा के तहत रोकी जा सकती है?

संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल रीवा के मानशिक रोग विभाग के डॉक्टर धीरेंद्र मिश्रा के द्वारा बताया गया की कई बार आरटीआई दायर कर आवेदकों के द्वारा किसी मरीज के विषय में जानकारी मांगी जाती है। यह किस हद तक देय होती है रोकी जाए तो उसका क्या आधार होता है? डॉ मिश्रा ने कहा कि वह मनोचिकित्सक हैं और कई बार उनके मानसिक दृष्टि से रोगी सरकारी कर्मचारियों के विषय में भी जानकारी मांगी जाती है जिस का दुरुपयोग हो सकता है अतः इस विषय में क्या किया जाना उचित होगा। इस प्रश्न का जवाब देते हुए पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त गांधी ने बताया कई बार इस प्रकार की जानकारी धारा 8(1)(जे) का हवाला देकर रोक दी जाती है जो कि गलत है। यह जानकारी फ़ेडयूशरी प्रकृति की होती है जो धारा 8(1)(ई) के तहत विशेष परिस्थितियों में देने से मना किया जा सकता है लेकिन उसके लिए भी पर्याप्त कारण बताने होंगे की जानकारी फ़ेडयूशरी क्यों है। इस विषय पर कुछ प्रतिभागियों के द्वारा कहा गया कि सरकारी कर्मचारी गलत तरीके से मेडिकल बनवाकर दुरुपयोग करते हैं इसलिए डॉक्टर के मेडिकल रिपोर्ट की जानकारी आवेदक को दी जानी चाहिए इस पर श्री गांधी ने कहा कि इसमें यदि लार्जर पब्लिक इंटरेस्ट बताया जाए तो धारा 8(2) के तहत यह जानकारी आवश्यक तौर पर देय होती है।

प्रतिभागियों ने पूछे प्रश्न और सूचना आयुक्तों ने दिए जवाब

उत्तराखंड से अंकित बण्ठबाड़ ने पूछा कि उन्होंने आरटीआई लगाया था तो 35 हज़ार रु शुल्क जमा कर जानकारी लेने के लिए कहा गया। इस पर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने कहा कि लोक सूचना अधिकारी से धारा 2(जे)(1) के तहत निरीक्षण की माग की जानी चाहिए और जो आवश्यक होगा जानकारी ली जानी चाहिए।

ओमाराम बंजारा को जानकारी के लिए डेढ़ करोड़ जमा करने के लिए कहा गया

देवेंद्र अग्रवाल ने राजस्थान से ओमराम बंजारा की बात रखते हुए कहा कि अभी हाल ही में न्यूज़पेपर में एक ऐसी खबर थी जिसमें डेढ़ करोड़ से अधिक राशि जमा कर जानकारी प्राप्त करने के लिए कहा गया था। इस पर ओमराम बंजारा ने कहा कि उनके द्वारा कई बिंदुओं पर जानकारी चाही गई थी। समाधान करते हुए जहां शैलेश गांधी ने एडीआर पीयूसी केस का हवाला दिया वहीं राहुल सिंह ने कहां की जानकारी हमेशा ऐसी पूछनी चाहिए जो स्पष्ट हो और कम हो। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए सूचना आयुक्तों के द्वारा बताया गया कि ज्यादा बृहद जानकारी देने में शासकीय श्रम का अपव्यय होता है इसलिए ज्यादा बृहद जानकारी नहीं मांगनी चाहिए। ऐसी जानकारी देने में लोक सूचना अधिकारी कुछ इस प्रकार बहाने बनाता है। यद्यपि यदि आवेदक को लगता है कि जानकारी न देने के लिए डेढ़ करोड़ रुपए का हवाला दिया गया है तो यह अनुचित है और इसकी शिकायत धारा 18 के तहत संबंधित सूचना आयोग में की जानी चाहिए।

ओमराम बंजारा के द्वारा बताया गया कि उप पंजीयक कार्यालय रोहट पाली में प्रति पेज 230 रु भुगतान करने के लिए कहा गया है जबकि आरटीआई कानून में धारा 22 में स्पष्ट उल्लेख है कि आरटीआई कानून अन्य सभी अधिनियम के ऊपर होगा और कॉपी के चार्ज मात्र 2 रु प्रति पन्ने ही होंगे। इसलिए उप पंजीयक कार्यालय के द्वारा इतनी अधिक राशि मांगा जाना अनुचित है। इसी विषय पर पूर्व राज्य सूचना आयुक्त ने ग्वालियर में एक अनपढ़ बीपीएल महिला के द्वारा कॉलेज में सर्विस बुक के विषय में चाही गई जानकारी का उल्लेख करते हुए बताया कि लोक सूचना अधिकारी ने महिला को निरीक्षण करने के लिए कहा था। मामले का निपटारा नहीं हुआ तो मामला हाईकोर्ट पहुंचा था जहां पर मामला खारिज कर दिया गया था। दिल्ली से गौरव ने कहा की एक ट्रेंड सा चल पड़ा है जिसमें बैक डेट डालकर पीआईओ के द्वारा जवाब दिए जाते हैं जबकि जवाब महीनों बाद मिलते हैं इस विषय पर क्या किया जाए। सूचना राहुल सिंह ने धारा 18 के तहत शिकायत किए जाने का सुझाव दिया क्योंकि यहां अनुचित है।

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राजवीर सिंह होरा ने पूछा ऐसा प्रश्न जिससे सूचना आयोग की कार्यशैली पर लगा प्रश्न चिन्ह

 इंदौर से राजवीर सिंह होरा ने बताया कि वह एक पर्यावरण कार्यकर्ता हैं और पर्यावरण के मुद्दों को लेकर आरटीआई लगाते आए हैं और कार्य कर रहे हैं। कई मामलों पर उन्होंने आरटीआई लगाकर वन विभाग आदि से संबंधित व्यापक भ्रष्टाचार उजागर किए हुए हैं और कार्यवाही भी करवाई है। अभी हाल ही में इंदौर संभाग के वर्तमान राज्य सूचना आयुक्त सुरेंद्र सिंह पूर्व डीजीपी के आदेश का हवाला देते हुए बताया की उनके द्वारा आरटीआई आवेदकों के विरोध में निर्णय दिए जा रहे हैं। अपने ही प्रकरण में उन्होंने कहा कि जहां लोक सूचना अधिकारी ने उन्हें जानकारी दे दी थी वही आयुक्त सुरेंद्र सिंह ने कहा कि लोक सूचना अधिकारी द्वारा ऐसी जानकारी क्यों दे दी गई। जबकि राजवीर सिंह के द्वारा बताया गया कि इसके पहले उन्हीं सुरेंद्र सिंह के द्वारा 10,000 पन्ने की जानकारी दिलवाई गई थी। अतः यह सब कार्य लोक सूचना अधिकार कानून के विरुद्ध हैं। इसका उत्तर दिया गया तो डीजीपी सुरेंद्र सिंह के द्वारा बताया गया कि वह मोटी बुद्धि के व्यक्ति हैं और जाकर कहीं भी इसकी शिकायत कर दिया जाए। इस विषय पर आत्मदीप ने कहा सूचना आयुक्तों को इस प्रकार व्यवहार नहीं करना चाहिए और यदि ऐसी बात है तो सभी को मिलकर मुख्य सूचना आयुक्त के समक्ष इस बात की शिकायत की जानी चाहिए और साथ में राष्ट्रपति एवं राज्यपाल को भी शिकायत की जा सकती है। मामले पर हाई कोर्ट में जाकर याचिका दायर करने की सलाह दी गई। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र से एम गांधी ने कहा कि उन्होंने आयोग में इंटरव्यू दिया था और उसी के संदर्भ में कुछ जानकारी चाहिए थी तो धारा 11 का हवाला देकर जानकारी नहीं दी गई। इस पर राहुल सिंह ने कहा कि कई बार धारा 11 के तहत थर्ड पार्टी की जानकारी बता कर जानकारी रोक ली जाती है। और इन मामलों में लोक सूचना अधिकारी के निर्णय ही अंतिम निर्णय होते हैं। इसकी शिकायत धारा 18 के तहत तथा अपील धारा 19(3) के तहत सूचना आयोग में की जा सकती है। साथ में धारा 10 के तहत वह जानकारी दिए जाने की माग की जा सकती है और जो न देने योग्य हो वह छुपाई जा सकती है।


आरटीआई जनजागरण को लेकर इतिहास बनाने की तरफ अग्रसर एक छोटा सा प्रयास


39 वें वेबीनार में आरटीआई कानून से जुड़े हुए विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई और प्रतिभागियों ने अपने अपने प्रश्न पूछे और विचार रखे। प्रत्येक रविवार को सुबह 11:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक आयोजित होने वाला राष्ट्रीय वेबीनार पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। देश के विभिन्न कोनों से आरटीआई कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, एनवायरमेंटल एक्टिविस्ट, सिविल राइट एक्टिविस्ट और विशेषज्ञ जुड़ते हैं और अपनी बातें स्वतंत्रता पूर्वक रखते हैं और बेहद हेल्थी और ओपन डिस्कशन में सम्मिलित होते हैं। जिस प्रकार वर्तमान राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह कार्यक्रम में अपनी सहभागिता देकर बेबाकी के साथ सभी पार्टिसिपेंट्स का मनोबल बढ़ाते हैं और हर प्रकार से छोटे से लेकर बड़े प्रश्नों का जवाब देते हैं उससे कार्यक्रम में एक नया उत्साह बना रहता है। कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी एवं राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप के साथ अन्य विभिन्न विशिष्ट प्रतिभागियों की वजह से कार्यक्रम में विशेष इंटरेस्ट आ जाता है।

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