🔴 आरटीआई की धारा 4 की स्थिति अनाथ जैसी हो चुकी है

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आरटीआई कानून को जन जन तक पहुंचाने के लिए वेबीनार के माध्यम से कार्यक्रम के आयोजन किए जा रहे हैं। इस बीच देश के कोने कोने से आरटीआई एक्टिविस्ट, सामाजिक कार्यकर्ता एवं अन्य गणमान्य नागरिक सम्मिलित होते हैं। इस बीच दिनांक 18 अप्रैल 2021 को 43 वें राष्ट्रीय वेबीनार का आयोजन किया गया जिसमें सूचना के अधिकार कानून और शिक्षा विभाग से संबंधित विषयों पर लगभग 3 घंटे की वृहद परिचर्चा आयोजित की गई। इस बीच कार्यक्रम की अध्यक्षता मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने किया जबकि विशिष्ट अतिथि के तौर पर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त एवं प्रोफ़ेसर श्रीधर आचार्युलु एवं श्री शैलेश गांधी तथा कर्नाटक से आरटीआई स्टडी सेंटर के ट्रस्टी एवं चर्चित आरटीआई एक्टिविस्ट वीरेश बेल्लूर सम्मिलित हुए। छत्तीसगढ़ एवं अन्य राज्यों से भी शिक्षा विभाग में महारत रखने वाले कई विशेषज्ञ सम्मिलित हुए। वीरेंद्र कुमार, सुरेंद्र जैन, देवेंद्र अग्रवाल, आलोक सिंह, सुनीता जैन सहित कई विशेषज्ञों ने अपनी अपनी बातें रखी।

कार्यक्रम का संचालन संयोजन एवं प्रबंधन का कार्य अधिवक्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट नित्यानंद मिश्रा, देवेंद्र अग्रवाल, शिवेंद्र मिश्रा, अंबुज पांडे एवं शिवानंद द्विवेदी के द्वारा किया गया।

कार्यक्रम में सूचना आयुक्त राहुल सिंह, पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी एवं आरटीआई एक्टिविस्ट वीरेश बेल्लूर ने भी शिक्षा और आरटीआई विषय पर अपने उद्बोधन रखे।

इमरजेंसी के दौरान की शिक्षा नीति में परिवर्तन आवश्यक

 कार्यक्रम में दूसरी बार विशिष्ट अतिथि के रुप में सम्मिलित हुए पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त एवं ला यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर श्रीधर आचार्युलु ने बताया कि इमरजेंसी के दौर में 1978 में शिक्षा को राज्यों की सूची से हटा दिया गया था तभी से शिक्षा नीति का केंद्रीकरण प्रारंभ हुआ। इसके बाद भी इस विषय पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। इस विषय पर तब भी सलाह दी गई कि राज्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और शिक्षा को स्थानीय स्तर पर प्लान किया जाए क्योंकि शिक्षा का महत्व जिस प्रकार पंचायत स्तर, जिला परिषद, नगर निगम, नगर परिषद समझ पाएंगे वैसा विदेशों और केंद्र में बैठे हुए लोग नहीं समझ सकते। शिक्षा का ढांचा और विकास किस प्रकार किया जाए एवं किस भाषा में हो यह उस राज्य पर छोड़ देना चाहिए था जहाँ के लिए शिक्षा है परंतु ऐसा नहीं किया गया। प्रोफेसर आचार्युलु ने बताया कि हमारी सरकार नई शिक्षा नीति के साथ हर बात का केंद्रीकरण कर रही हैं और उसे ब्यूरोक्रेटिक रूप दिया जा रहा है जो कि हमारे शिक्षा के क्षेत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। यदि हम नई शिक्षा नीति 2020 को देखें तो न केवल पूरा देश बल्कि विश्व कोरोनावायरस की चपेट में था तब यह नई शिक्षा नीति देश पर थोप दी गई है। पारदर्शिता की दृष्टि से भी यदि देखा जाए तो यह उचित नहीं है। नई शिक्षा नीति लाने में पारदर्शिता का बहुत बड़ा अभाव रहा है। जिस जिस प्रकार नोटबंदी, किसान बिल रातों-रात बिना किसी सूचना के थोप दिए गए वैसे ही नई शिक्षा नीति भी रातों-रात थोप दी गई। सरकार ने कहा की यह नई शिक्षा नीति है इसे स्वीकार करो अथवा मरो। लोकतंत्र के हिसाब से पूरी तरह से पारदर्शी प्रक्रिया कहीं जाएगी। इस प्रकार की नीति का प्रभाव पूरे देश और समाज पर बुरा पड़ता है। विद्यार्थी और शिक्षकों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। सरकार कहती है कि उन्होंने लोगों से संपर्क किया है और विचार विमर्श करने के बाद नई शिक्षा नीति लाई गई है लेकिन यह किसी को नहीं पता कि कहां और किस से क्या संपर्क किया गया। सरकार के पास इसका कोई जबाब नहीं कि द्इस नीति के विषय में किसके साथ कंसल्टेशन किया गया और फिर कंसल्टेशन किया भी गया तो इस प्रकार का कंसल्टेशन क्यों स्वीकार किया गया यह सब समीक्षा संसद और असेंबली में होनी चाहिए लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया। प्रोफेसर आचार्यलु ने कहा कि इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि जो भी नीतियां लाई जाती है उनका हमारे लिए क्या उपयोग होगा कैसे वह हितकारी होगी इस विषय पर पारदर्शी व्यवस्था होनी चाहिए लेकिन इस पर भी कोई बात नहीं की गई। हमें लगता है यहां राष्ट्रीय शिक्षा नीति के काफी खतरे हैं। प्रोफेसर आचार्यलु ने कहा कि यदि इस शिक्षा नीति पर हम विचार-विमर्श नहीं करेंगे तो यह उचित नहीं कहा जाएगा।

🔴 शिक्षण संस्थान का निजीकरण और विदेशी संस्थाओं को भारत में अनुमति खतरनाक हो सकता है

  नई शिक्षा नीति में कई शिक्षण संस्थाओं के निजीकरण को लेकर एवं साथ में विदेशी विश्वविद्यालयों और संस्थानों को भारत में अनुमति प्रदान करने के खतरे को लेकर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त ने आगाह करते हुए बताया कि इसके भी खतरे हैं। शिक्षण संस्थाओं में जब तक पारदर्शिता का अभाव रहेगा और धारा 4 के तहत साझा की जाने वाली जानकारी स्वयं ही साझा नहीं की जाती तो इसके खतरे हैं। डॉ आचार्यलु ने कहा कि वह नई शिक्षा नीति के विरोध में नहीं है और न ही निजीकरण और विदेशी संस्थाओं के भारत में एंट्री का ही विरोध करते हैं लेकिन उन्होंने कहा कि इसमें हम सावधान करना चाहते हैं और चेतावनी भी देना चाहते हैं क्योंकि यह दोनों ही बड़े निर्णय बिना पारदर्शिता के खतरनाक हो सकते हैं। निजी विश्वविद्यालय के क्या दायित्व होंगे इस विषय पर स्पष्टता होना अनिवार्य है। 
   प्रो आचार्युलु ने आगे कहा कि यदि विश्वविद्यालयों का निजीकरण किया जाता है तो यह सार्वजनिक क्षेत्र के शिक्षा व्यवस्था से परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से सिस्टम से सरकार का बाहर होना है। अपरोक्ष रूप से बाहर होना इसलिए है क्योंकि जो खाली पद हैं उन्हें भरा नहीं जाएगा और यदि कुलपति के पद भरे जाते हैं तो वहां राजनीतिक लोगों का हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार बढ़ेगा एवं पैसे की लेनदेन से ऐसे पद भरे जायेंगे। इस प्रकार के पद योग्यता और वरीयता के आधार पर भरे जाने चाहिए लेकिन ऐसा नही होगा। उन्होंने महान दर्शनशास्त्री सर्वपल्ली राधाकृष्णन का हवाला देते हुए कहा कि किस प्रकार डॉ राधाकृष्णन को ब्रिटेन की फेमस लीड यूनिवर्सिटी में कुलपति के तौर पर आमंत्रित किया गया था। लेकिन यदि हम भारत की तरफ देखें तो हमारे विश्वविद्यालय रिहैबिलिटेशन सेंटर बन के रह गए हैं।

तेलंगाना में शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को बना दिया 12 विश्वविद्यालय का कुलपति

  पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त एवं प्रोफेसर आचार्युलु ने तेलंगाना का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां पर ब्यूरोक्रेसी इस प्रकार हावी है कि 12 विश्वविद्यालयों के कुलपति का प्रभाव तेलंगाना के शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को दे दिया गया है। उन्होंने कहा यदि ब्यूरोक्रेसी के लोग शैक्षणिक संस्थाओं के कुलपति होंगे तो जाहिर है ऐसे संस्थानों का क्या होगा। इसी प्रकार प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के विषय में भी देखा जाए तो यहां भी कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती है साथ ही यदि कोई व्यक्ति आरटीआई दायर कर जानकारी मांगता है तो वह भी जानकारी नहीं दी जाती है। श्री आचार्यलु ने मप्र सूचना आयुक्त राहुल सिंह का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार उनके द्वारा बताया गया कि विश्वविद्यालय स्तर पर ऐसे लोक सूचना अधिकारियों को कोई ट्रेनिंग नहीं दी जाती है। यदि हम लॉ यूनिवर्सिटी की बात करें तो वहां का भी लोक सूचना अधिकारी एक विधि विज्ञान का प्रोफेसर होता है लेकिन वह व्यक्ति आरटीआई कानून को भार की तरह समझता है और कानून के बारे में कुछ नहीं जानना चाहता। यह बहुत ही शर्मिंदगी पूर्ण और पथेटिक स्थिति कही जाएगी। प्रो आचार्यलु ने बताया यदि कॉलेज और यूनिवर्सिटी में किसी शिक्षक अथवा कर्मचारी की उपस्थिति रजिस्टर अथवा ली गई छुट्टी की जानकारी की डिटेल मांगी जाती है तो जानकारी निजी बोलकर मना कर दिया जाता है। यदि शिक्षक की जानकारी मांगी जाती है तो उसे व्यक्तिगत और निजी जानकारी देकर मना कर दिया जाता है। इसी प्रकार यह एक भयावह स्थिति है क्योंकि निजता का हवाला देकर आरटीआई कानून की धारा 8 और 9 बताकर काफी महत्वपूर्ण जानकारियां छुपाई जा रही है।
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🔴 आरटीआई की धारा 4 की स्थिति अनाथ जैसी हो चुकी है

  पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त प्रोफेसर आचार्यलु ने आगे कहा यदि देखा जाए तो आरटीआई कानून में धारा 4 सबसे महत्वपूर्ण होती है जिसमें लगभग 95 प्रतिशत से अधिक जानकारी स्वयं ही विभागों को सार्वजनिक किए जाने का दायित्व होता है लेकिन इसके बावजूद भी यदि हमे धारा 4(1)(बी) के 17 बिंदुओं के मैनुअल तक कि जानकारी भी नहीं दी जाती। धारा 4 में यदि कोई जानकारी मिल पाती है तो मात्र सूचना आयोग की वार्षिक रिपोर्ट में मिल पाती है जिसके बाद अनुशंसा भेजी जाती है की वस्तुस्थिति क्या है और क्या सुधार किए जाने चाहिए लेकिन ऐसी हजारों अनुशंसाऐं एसेंबली और संसद में पड़ी है जिनको पूछने वाला कोई नहीं है। धारा 4 को लेकर डॉ आचार्यलु ने सुझाव दिया कि यदि शिक्षा का निजीकरण और ब्यूरोक्रेटाइजेशन किया जाता है तो पारदर्शिता का होना आवश्यक है जिसे सभी शैक्षणिक संस्थान स्वयमेव भी जानकारी साझा करें। यह जानकारी समय-समय पर विद्यार्थियों उनके माता-पिता और गार्जियन के समक्ष साझा की जानी चाहिए। अन्यथा की स्थिति में निजता और सीक्रेसी की समस्या सामने आती रहेगी। भ्रष्टाचार भी इसी निजता के पीछे का ही हिस्सा बना रहेगा क्योंकि निजता की आड़ में भ्रष्टाचार होता रहेगा और किसी को कोई जानकारी का पता नहीं चलेगा। और साथ में शिक्षा विभाग आम नागरिक की पहुंच से दूर बना रहेगा। इस समस्या का समाधान तभी होगा जब धारा 4(1)(बी) के 17 बिंदुओं के मैनुअल को आवश्यक तौर पर सार्वजनिक किया जाएगा और इस विषय में सरकार को खास तौर पर सभी शैक्षणिक संस्थाओं में पारदर्शिता स्थापित करने के विशेष तौर पर प्रबंध करने की आवश्यकता है।


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