उमरिया म.प्र.//नौरोजाबाद// देवरी और महुरी को जोड़ने वाला पुल पूरी तरह जर्जर, पुल हो चुका बड़े गढ्ढों में तब्दील, सड़के भी खराब, बड़ी अनहोनी की आशंका

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पुल पूरी तरह जर्जर, पुल हो चुका बड़े गढ्ढों में तब्दील, बड़ी अनहोनी की आशंका
नौरोजाबादकिसी नदी पर बना पुल एक गांव को दूसरे गांव से जोड़ने, जिसके साथ कई गांव जुड़े होते है, वहाँ रहने वाले लोगो के आवागमन और व्यापार करने के लिए बहुत जरूरी होता है। एक तरफ शासन हर गांव को पक्की सड़क से जोड़ने की बात कर रही है, लेकिन सच्चाई कुछ और ही है।
बात करे ग्राम देवरी और महुरी को जोड़ने वाली मुख्य सड़क और पुल की, जिससे जुड़े पास के बहुत से गावों का आवागमन भी दिन और रात में बना रहता है। पूरी तरह से जर्जरता की मार पिछले कई वर्षों से झेल रहा है।


इस मार्ग में आज तक कभी पक्की सड़क का निर्माण नही हो पाया है और इन दोनों गावो को जोड़ने वाला पुल भी जर्जर हो चुका है जो अनहोनी को न्योता दे रहा है।इस पर बड़े गढ्ढे बन गए है जिसकी वजह से कई बार हादसे भी होते रहते है लोग गिर कर चोटिल हो जाते है। और बरसात के मौसम में पुलिया पूरी तरह जलमग्न हो जाती है। पर इस मार्ग में इकलौता रास्ता होने की वजह से लोग जान जोखिम में डाल पुल पार करते हैं जिससे कई बार लोगो के नदी में बह जाने की बात सामने आती रहती है।
गांव के लोग बताते हैं कि
पुलिया के निर्माण हुए 10 से 15 वर्ष बीत गए है। जो बनने के कुछ साल बाद से छतिग्रत है। लेकिन मजबूरी यह है कि कोई दूसरा रास्ता भी नही है इस लेकिन लोगों की मजबूरी है इस पुल के अलावा पास से कोई दूसरा रास्ता नही एक गांव से दूसरे गांव तक जाने का

कुछ वर्ष पहले तक पुल के ऊपर दोनों तरफ चलने लायक सड़क भी नही थी।
पर एक इंसान ने मानवता की ऐसी मिसाल पेश की उन्होंने किसी से मदद की आशा किए बगैर अकेले दम पर पुल के दोनों ओर चलने लायक सड़क का निर्माण कर डाला।

जब बात इतनी अहम है तो हम उस महान इंसान श्री दादूराम पाल को कैसे भूल सकते है,जिन्होंने अपने दम पर पुल के दोनों तरफ कठिन चढ़ाई में सड़क बना दी ,आइए जाने इनकी सख्सियत के बारे में :-
खुद रोज मजदूरी करके अपना परिवार चलाने वाले दादूराम पाल मामूली सुख सुविधाओं में ही आज तक गुजारा कर रहे है, पर अगर हम इन्हें दूसरा दशरथ मांझी कहें तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी। जिस तरह दशरथ मांझी ने दिन रात पहाड़ तोड़कर अपने कई वर्षो की मेहनत और कठिन परिश्रम से पहाड़ में सड़क बना दी थी। ठीक उसी प्रकार दादूराम पाल जी ने अपने वर्षो के कठिन परिश्रम से पुल के ऊपर मिट्टी के ऊंचे टीलों को काटकर अकेले ही सिर पर मिट्टी ढोकर नदी के पत्थरों को तोड़कर इन महान पुरुष ने सालों की लगातार जीतोड़ मेहनत और लगन से नदी के पत्थरों को तोडकर फिर अपने कंधों से ढो- ढोकर बड़ी शिद्दत से पुल के दोनों तरफ ऊंची चढ़ाई में चलने लायक सड़क का निर्माण किया।

फिर भी शासन प्रशासन ने कभी दादूराम पाल के इस समर्पण भाव के सम्मान करने के बारे में छोड़िए उनका हाल भी जानने की कोसिस नही की। किसी नेता ने यहां तक किसी सरपंच ने भी उनकी सुध नही ली । किसी ने सड़क पर ध्यान नही दिया और न पुल की हालत का जायजा कभी लिया गया।

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अगर इस नदी पर नया पुल बन गया और दोनों तरफ पक्की सड़क बन जाए, तो यह सभी के लिए सिर्फ सुविधा की बात होगी। पर आज हमने जिन महान इंसान का जिक्र किया यह उनका एक सपना है जो पूरा हो जाएगा। जिसे उन्होंने खुली आँखों से सभी के भलाई के लिए देखा है।

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