कार्यक्रम में देश के कोने कोने से जुड़े आर टी आई एक्टिविस्ट और वरिष्ठ पत्रकार

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RTI सरकार और पत्रकारिता विषय पर  राष्ट्रीय वेबिनार

आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो संजय द्विवेदी ने बताया मीडिया में RTI की आवश्यकता

रीवा। सूचना के अधिकार कानून 2005 को आमजन तक पहुंचाने के लिए कोविड-19 दौर में जब व्यक्ति से व्यक्ति का संपर्क टूट गया ऐसे में इंटरनेट और वर्चुअल माध्यमों का सहारा लेते हुए ऑनलाइन वेबीनार का आयोजन प्रारंभ किया गया। इस बीच सूचना के अधिकार विषय पर 51 वें राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। जिसमें वर्तमान एवं पूर्व सूचना आयुक्त और पत्रकारिता जगत के चर्चित चेहरे सहित आरटीआई एक्टिविस्ट जुड़े। कार्यक्रम की अध्यक्षता मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने की जबकि विशिष्ट अतिथि के तौर पर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी, पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप, भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक और वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक लेखक प्रोफेसर संजय द्विवेदी, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर के स्कूल आफ जर्नलिज्म एवं मास कम्युनिकेशन की विभागाध्यक्ष डॉ. सोनाली नरगुंदे, माहिती अधिकार मंच मुंबई के संयोजक भास्कर प्रभु, कामनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव सी एच आर आई प्रोग्राम प्रमुख व्यंकटेश नायक, वरिष्ठ लेखक साहित्यकार स्तंभकार एवं पत्रकार जयराम शुक्ला, आरटीआई स्टडी सेंटर कर्नाटक के ट्रस्टी वीरेश बेलूर सहित अन्य पत्रकार संपादक सिविल ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट कार्यक्रम में जुड़े।
   कार्यक्रम का संयोजन एवं प्रबंधन का कार्य आरटीआई एक्टिविस्ट एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी, अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा, आरटीआई एक्टिविस्ट देवेंद्र अग्रवाल, अधिवक्ता शिवेंद्र मिश्रा अंबुज मिश्रा एवं पवन दुबे ने किया।

*पत्रकारिता और आरटीआई का बहुत गहरा संबंध -प्रो.संजय द्विवेदी*

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  कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रुप में पधारे भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक प्रोफ़ेसर संजय द्विवेदी ने बताया की पत्रकारिता और आरटीआई का बहुत गहरा संबंध है। उन्होंने आरटीआई कानून के उद्भव और उसके महत्व पर प्रकाश डाला और पत्रकारिता की स्वतंत्रता और निष्पक्षता के विषय में चर्चा की। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने बताया कि कई बार बिना आरटीआई लगाये भी पत्रकारों को जानकारी प्राप्त हो जाती है क्योंकि पत्रकारों का यह कहना होता है की आरटीआई लगाकर यदि 30 दिन का इंतजार करते हैं तो जानकारी छापने में देरी हो जाती है परंतु पत्रकारिता जगत के वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक श्यामलाल यादव का उदाहरण देते हुए सभी ने बताया कि उन्होंने आरटीआई का उपयोग करते हुए किस तरह से जानकारियां प्राप्त की है और पत्रकारिता के क्षेत्र में नया आयाम स्थापित किया है। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार जयराम शुक्ला ने पत्रकारिता और आरटीआई से संबंधित महत्वपूर्ण और गूढ़ विषयों पर चिंतन करते हुए बहुत ही गहरे संबंध बताएं। जयराम शुक्ला ने बताया आरटीआई कानून जब आया तो लगा कि जैसे आम व्यक्ति को एक ताकत मिल गई है लेकिन समय के साथ ताकत का सही उपयोग न होने की वजह से और साथ में जानकारी छुपाए जाने के कारण पारदर्शिता और जवाबदेही में कमी आ रही है जो की चिंता का विषय है जिसे सब को मिलकर काम करने की जरूरत है। कार्यक्रम में आरटीआई एक्टिविस्ट वीरेश बेलूर ने कर्नाटक में उदाहरण देते हुए कई पत्रकारों पर हुए हमले और यहां तक कि हत्या के विषय में चिंता जाहिर करते हुए बताया कि जानकारी प्राप्त कर उसे छापने के कारण पत्रकारों को जान से हाथ भी धोना पड़ा है। लेकिन आरटीआई से प्राप्त जानकारी को पत्रकारिता में उपयोग कर काफी बदलाव आ रहे हैं और यह निरंतर जारी है। माहिती अधिकार मंच के संयोजक भास्कर प्रभु ने कहा की सूचना आयुक्तों को धारा 4 के प्रावधान को लागू करवाना चाहिए और साथ में आरटीआई आवेदकों को हर्जाना भी दिलवाया जाना चाहिए। कार्यक्रम में सी एच आर आई के प्रोग्राम प्रमुख एवं एनसीपीआरआई के सह संयोजक वेंकटेश नायक ने बताया की प्रारंभ से ही जब वह जेएनयू में ग्रेजुएशन ले रहे थे तब से ही सामाजिक और आरटीआई कार्यों में रुचि ले रहे हैं। उन्होंने आरटीआई कानून एनसीपीआरआई में योगदान और सी एच आर आई में योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया किस प्रकार विभाग बजट से संबंधित जानकारी पब्लिकली साझा नहीं करते और लॉगिन और पासवर्ड में छुपा कर रखते हैं। उन्होंने इस प्रथा को बंद करते हुए पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाए जाने के लिए सूचना आयोग के द्वारा की जाने कार्य वाली कार्यवाही पर जोर दिया।
      कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने कहा की गिरीश चंद देशपांडे आदि जजमेंट के कारण आरटीआई कानून बहुत कमजोर हुआ है। उन्होंने बताया कि यद्यपि सूचना आयोग और अर्ध न्यायिक ऑर्डर स्पीकिंग आर्डर होने चाहिए लेकिन यहां तक कि गिरीश चंद्र देशपांडे जैसे मामलों में बहुत कुछ छुपाया गया है और तर्क की कमी महसूस होती है। पूर्व राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने वृहद चर्चा करते हुए आरटीआई और पत्रकारिता पर अपने अनुभव साझा किए और बताया कि किस प्रकार उन्होंने स्वयं पत्रकारिता जगत में आरटीआई का उपयोग किया है और किस प्रकार आरटीआई कानून को ड्राफ्ट करने से लेकर इस पूरे आंदोलन में मजदूर किसान शक्ति संगठन और एनसीपीआरआई से संबंधित रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता के गिरते स्तर और ब्लैक मेलिंग के हिसाब से आरटीआई लगाए जाने पर भी चिंता जाहिर करते हुए कहा इस प्रथा को भी बंद करना चाहिए ताकि कानून बचा रहे और इसकी गरिमा भी बची रहे।
      इस बीच सभी वक्ताओं के कथन के उपरांत कार्यक्रम के अंत में उपस्थित आरटीआई एक्टिविस्ट और कार्यकर्ताओं से प्रश्न लिए गए जिसका की उपस्थिति सभी वक्ताओं और विशेषज्ञों ने एक-एक कर जवाब दिया। इस बीच अभी हाल ही में महाराष्ट्र सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा शैलेश गांधी बनाम महाराष्ट्र सरकार संबंधी प्रथम अपीलीय अधिकारी और अर्ध न्यायिक व्यवस्था में वर्चुअल हियरिंग को बढ़ावा देने संबंधी कोर्ट के आदेश भी चर्चा का विषय रहा। सभी उपस्थित एक्सपर्ट ने प्रथम अपील संबंधी वर्चुअल हियरिंग के इस आदेश को समस्त प्रदेशों में सूचना आयोगों अर्ध न्यायिक व्यवस्था में लागू करने के लिए जोर दिया।

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