मामलों की पेंडेंसी वाले सूचना आयुक्त को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं – शैलेश गाँधी

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मामलों की पेंडेंसी वाले सूचना आयुक्त को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं – शैलेश गाँधी// आरटीआई कानून की धारा 4 पारदर्शिता डिजाईन कैसे करें पर शैलेश गाँधी ने दिया प्रेजेंटेशन// कर्नाटक में 30 हज़ार से अधिक मामले लंबित – आरटीआई एक्टिविस्ट वीरेश// धारा 18 और 19 की शक्तियों का प्रयोग कर सूचना आयुक्त जानकारी करवाएं प्रदर्शित – शैलेश गाँधी

· मामलों की पेंडेंसी वाले सूचना आयुक्त को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं – शैलेश गाँधी//

· आरटीआई कानून की धारा 4 पारदर्शिता डिजाईन कैसे करें पर शैलेश गाँधी ने दिया प्रेजेंटेशन//

· कर्नाटक में 30 हज़ार से अधिक मामले लंबित – आरटीआई एक्टिविस्ट वीरेश//

· धारा 18 और 19 की शक्तियों का प्रयोग कर सूचना आयुक्त जानकारी करवाएं प्रदर्शित – शैलेश गाँधी

· राहुल सिंह के प्रयाश मील के पत्थर, ग्राम स्वराज लाने में अभूतपूर्व योगदान – शैलेश गाँधी

सूचना के अधिकार कानून को जन जन तक पहुचाने के उद्येश्य से प्रत्येक रविवार सुबह 11 बजे से दोपहर 01 बजे तक ज़ूम मीटिंग वेबिनार का आयोजन किया जा रहा है. कार्यक्रम की अध्यक्षता मप्र राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह करते हैं जबकि विशिष्ट अतिथि के तौर पर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गाँधी, पूर्व मप्र राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप, माहिती अधिकार मंच मुंबई के संयोजक भास्कर प्रभु जी सम्मिलित होते हैं. इस रविवार कार्यक्रम में एक अन्य अतिथि भी सम्मिलित हुए. कर्नाटक वेल्लूर से आरटीआई एक्टिविस्ट वीरेश भी सम्मिलित हुए जिन्होंने अपनी बातें रखीं. कार्यक्रम में भारत के विभिन्न राज्यों मप्र, उप्र, राजस्थान, गुजरात, विहार, आन्ध्र प्रदेश, असम, नई दिल्ली, जम्मू कश्मीर, तमिलनाडु, झारखण्ड, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों से सहभागी सम्मिलित होते हैं जो अपनी बातें रखते हैं और प्रश्नों के जबाब पाते हैं.

41 वें कार्यक्रम के सफल आयोजन में मुख्य रूप से कार्यक्रम का संयोजन एवं प्रबंधन का कार्य अधिवक्ता एवं आर टी आई एक्टिविस्ट नित्यानंद मिश्रा, अम्बुज पाण्डेय, शिवानन्द द्विवेदी, देवेन्द्र अग्रवाल, पत्रिका समूह से वरिष्ठ पत्रकार मृगेंद्र सिंह करते हैं.

वेल्लूर से वीरेश ने बताया सूचना आयोगों में बढ़ रही पेंडेंसी

कार्यक्रम में पहली मर्तबा कर्नाटक से पधारे आरटीआई एक्टिविस्ट वीरेश ने बताया की सूचना आयोगों में आयुक्तों के काम न करने के कारण मामलों की संख्या बढती जा रही है. उन्होंने कर्नाटक सूचना आयोग के विषय में चर्चा करते हुए बताया की अभी भी कई बेंच में जहां 2021 के मामले लिए जा रहे हैं वहीँ कई बेंच में वर्ष 2015 के मामले पेंडिंग पड़े हुए हैं. इस पर चिंता जाहिर करते हुए वीरेश ने कहा की वास्तव में सूचना के अधिकार का कानून जिस मंशा के अनुरूप लाया गया था वह पूरी नहीं हो पा रही है. धारा 4 पर प्रकाश पर प्रकाश डालते हुए वीरेश ने बताया की धरा 4 की मंशा के अनुरूप ज्यादा से ज्यादा जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर सुओ मोटो स्वयमेव ही साझा की जानी चाहिए थी और और सभी सरकारी विभागों को इस पर कार्य करना था लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है जिससे ऐसी जानकारियां जिसे आम पब्लिक को बिना किसी मेहनत और आवेदन के उपलब्ध कराया जाना चाहिए था उसके लिए आरटीआई लगाकर भटकना पड़ रहा है. वहीँ दूसरी तरफ कंप्लायंस पर प्रकाश डालते हुए भी वीरेश द्वारा बताया गया की कई बार सूचना आयोगों के निर्णय के बाबजूद भी जानकारी आवेदकों को उपलब्ध नहीं हो पा रही है.

वीरेश द्वारा बताया गया की जहाँ लोअर कोर्ट की मोनिटरिंग करने के लिए हाईकोर्ट है, और हाईकोर्ट की मॉनिटरिंग करने के लिए सुप्रीम कोर्ट है वहीँ सूचना आयोग और अन्य आयोगों की मोनिटरिंग करने के लिए कोई अथॉरिटी नहीं होने से भी आयोग स्वतंत्र है जिससे कोई अंकुश नहीं रहता. यदि सूचना आयोग कार्य नहीं कर रहा है तो उसके कार्यों की निगरानी करने के लिए भी कोई न कोई मैकेनिज्म होनी चाहिए इस पर भी जोर दिया जाना चाहिए.

आरटीआई कानून की धारा 4 – डिजाइनिंग ट्रांसपेरेंसी पर शैलेश गाँधी ने दिया प्रेजेंटेशन

पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त और कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि शैलेश गाँधी ने आरटीआई कानून की धारा 4 और धारा 18 एवं 19 पर चर्चा की. पारदर्शिता का सिद्धांत ही आरटीआई कानून की मुख्य आधारशिला है. सरकारी कामकाज को पारदर्शी बनाया जाना चाहिए और अधिक से अधिक जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए. कानून की धारा 4 का उद्येश्य भी मूलतः यही है. धारा 4 का स्पष्ट मंतव्य है की बिना किसी आवेदन के ही ज्यादा से ज्यादा जानकारी आम जनता की पहुँच में आ जाये. इस प्रकार अपने प्रेजेंटेशन में शैलेश गाँधी ने पारदर्शिता डिजाईन करने पर बल दिया. वहीँ उन्होंने सूचना आयुक्त को धारा 18 और 19 के तहत जो जो शक्तियां प्राप्त हैं उन पर भी प्रकाश डाला. श्री गाँधी ने बताया की ऐसी बहुत सी जानकारी हो सकती है जो पब्लिक पोर्टल पर उपलब्ध नहीं रहती है उसके लिए आयोग के पास धारा 19 के तहत शक्तियां रहती हैं जिसमे वह कतिपय जानकारी पोर्टल पर पब्लिश करवा सकता है. वहीँ धरा 18(1)(एफ) के तहत किसी आवेदक की शिकायत पर संज्ञान लेते हुए सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत सिविल जज की ताकत का प्रयोग कर कार्यवाही करते हुए जुर्माना लगा सकता है.

शैलेश गाँधी ने बताया की जब वह केन्द्रीय सूचना आयुक्त थे तब इस प्रकार के सैकड़ों आदेशों के माध्यम से पब्लिक फोरम में जानकारियां सार्वजनिक करवाने में भूमिका अदा की थीं. आर्थिक तौर पर कमजोर वर्गों के लिए, और जो अंडर ट्रायल प्रिजनर हैं उनसे सम्बंधित जानकारी पब्लिक करने के लिए आदेशित किया था. एक मामले पर प्रकाश डालते हुए श्री गाँधी ने बताया की उन्होंने दिल्ली के पुलिश कमिश्नर को कुछ जानकारी पब्लिकली साझा करने के आदेश दिए तो कमिश्नर ने कहा की वह प्रयाश करेंगे लेकिन गाँधी ने कहा की उन्हें प्रयास नहीं बल्कि आदेश का पालन करना पड़ेगा अन्यथा यदि शिकायत आई तो जुरमाना लगाया जायेगा जिस पर कमिश्नर ने कहा की वह ऐसा नहीं कर सकते. इसके बाद कमिश्नर ने जानकारी को एक विशेष फॉर्मेट में पब्लिकली साझा किया.

सूचना आयुक्त राहुल सिंह का आदेश मील का पत्थर

मप्र राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह के अभी हालिया के एक आदेश का जिक्र करते हुए शैलेश गाँधी ने कहा की मप्र की ग्राम पंचायतों में भ्रष्ट्राचार पर प्रहार करते हुए धारा 40 और 92 के प्रकरणों को जिसमे सरपंचों को पद से पृथक करना और पदाधिकारियों से सरकारी गबन की राशि की वसूली करवाना समिल्लित है यह एक लैंडमार्क निर्णय है. इससे ग्राम स्वराज लाने में मदद मिलेगी और भ्रष्ट्राचार की जानकारी आम जनता तक पहुँच पायेगी. सूचना आयुक्त राहुल सिंह के लगातार किये जा रहे नवाचारों और अच्छे निर्णयों पर प्रकाश डालते हुए शैलेश गाँधी ने कहा की अन्य सूचना आयुक्तों को इससे काफी कुछ सीखने की जरुरत है.

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ज्ञातव्य हो की अभी हल ही में राहुल सिंह ने लोकपाल मनरेगा में लोक सूचना अधिकारी नियुक्ति सम्बन्धी आदेश देकर न केवल मप्र बल्कि पूरे भारत में सुर्खियाँ बटोरी थीं वहीँ अब धारा 40 और 92 के मामलों को सार्वजनिक पोर्टल पर विशेष प्रारूप में रखने के आदेश से काफी बदलाव की उम्मीद की जा रही है. शैलेश गाँधी ने कहा की उनका मत है की यदि सभी सूचना आयुक्त अधिक से अधिक जानकारी पब्लिक पोर्टल पर साझा करवाते हैं तो इससे आम जन को आरटीआई लगाकर भटकना नहीं पडेगा. पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त ने यह भी कहा की जो सूचना आयुक्त मामलों का निपटारा नहीं कर रहे हैं और उनकी कोर्ट में मामले 2015 से पेंडिंग पड़े हुए हैं उन्हें सूचना आयुक्त बने रहना का कोई अधिकार नहीं है.

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