क्या सवाल करना गुनाह है- स्वतंत्र शुक्ला

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हमें आज़ादी क्यों मिली, अगर मिली तो संविधान क्यों बना, अगर संविधान बना तो उसमें अधिकार क्यों मिला, क्या सवाल पूछना गुनाह है.? क्या जनता के हित की बात करना आज की सरकार द्वारा बनाए गए नए भारत में इम्पॉसिबल के साथ खतरा मोल लेने जैसा हो गया है.? हां, आज के दौर में पत्रकारिता करना कोई नई बात नहीं बल्कि, महात्मा गांधी औऱ गणेश शंकर विद्यार्थी के जमाने में भी ऐसा था। जब नेताओं अधिकारियों और बड़े समुदाय के लोगों में सच को दबाने का प्रयास प्रबल था। पत्रकारिता का इतिहास रहा है कि, पत्रकार न कभी किसी से डरा है न कभी रुका है बल्कि अदृश्य सिपाही की तरह हकीकत खंगालने में जुटा रहा है। लेकिन आज की पत्रकारिता में यह सब सम्भव नहीं…क्योंकि आज की पत्रकारिता मतलब नेताओं का मीडिया प्रभारी बनना, सही लिखना, सही बोलना, जनता के हित से जुड़े मुद्दे पर सवाल पूछना मतलब ख़ुद गलत होना और निगेटिव पत्रकारिता करना देशद्रोही बनना। चाटुकारिता अब चरम सीमा पर पहुंच चुकी है और यह चाटुकारी पत्रकार नहीं बल्कि नेता ही होते हैं और रिश्तेदारी जोड़ कर कहीं न कहीं से अपनी निगेटिव खबर को दबाने के प्रयास में सफलता हासिल करने के लिए उत्कृष्ट स्थान को प्राप्त करते हैं। खैर हम गलत हैं, क्योंकि हमारे ऊपर यह जनता नेताओं से भी ज्यादा भरोसा करती है। लेकिन उस जनता को यह नहीं पता होता कि, किसी भी सही खबर को चलाने के बाद नेताओ द्वारा हमारे ऊपर मानसिक और शारीरिक रूप से कितना प्रेशर बनाया जाता है। कितना झेलना पड़ता है इस बात का अंदाजा आम जनता द्वारा नहीं लगाया जा सकता।
हां हमारी वाहवाही तब होती है जब हम नेताओं की खबरें सिर्फ़ उनका मीडिया प्रभारी बन कर चलाएं और आलोचना तब होती है जब इन्हीं नेताओं द्वारा किए गए वादे जो ये भूल जाते हैं उसको हम याद दिलाते हैं। इनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार को उजागर करते हैं तब हम जनता की नजर में तो सही होते हैं क्योंकि हम उनके हित की बात करते हैं। लेकिन नेताओं द्वारा जब हमें दबाया जाता है तब हम मानसिक रूप से बीमार होते हैं। यह दौर कुछ ऐसा ही है, अगर हमें देश का बड़ा पत्रकार बनना है तो हमें जनता को भूल जाना चाहिए, सवाल करना भूल जाना चाहिए, सरकार के विरुद्ध बोलना और कलम उठाने से पहले भूल जाना चाहिए और यह तय कर लेना चाहिए कि स्थिति के अनुसार लिखने की बजाय जो नेता जी कहें वही लिखेंगे। जब आप नेता जी की भाषा सम्मानीय आदरणीय और माननीय लिखेंगे तो यह शब्द आपके ऊपर सभी मंचो में लागू होंगे आपकी वाहवाही होगी आदर सत्कार और सम्मान होगा अन्यथा आपको आलोचना का शिकार होने से भगवान भी नहीं बचा सकते हैं। किताबों में लिखी गई यह अलग बात है कि, आलोचक ही सबसे बड़े प्रशंसक होते हैं। लेकिन इस बात को व्यक्तित्व में सवार पाना मौजूदा वक़्त में असम्भव है। खैर रेत में खड़ा पेड़ कभी यह नहीं सोचता कि उसके यहां होने का क्या मतलब है। वह दूसरो के लिए खड़ा होता है, ताकि पता चले कि रेत में भी हरियाली होती है। जहां कहीं भी लोकतंत्र को हरे भरे मैदान से रेगिस्तान में तब्दील किया जा रहा है,वहां आज नागरिक होने और सूचना पर उसके अधिकार की लड़ाई थोड़ी मुश्किल जरूर हो गई है, मगर असंभव नहीं है।

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